विलुप्त हो रही सुआ नृत्य की परंपरा, कभी देते थे सुख-समृद्धि का आशीष, अब नहीं गूंजता "तरी..हरी..नहा..नरी"

रोहित वर्मा की रिपोर्ट खरोरा- आधुनिकता की चकाचौंध में कई पारंपरिक लोक नृत्य दम तोड़ रही हैं। प्रदेश की पहचान पारंपरिक सुआ नृत्य भी अब धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर है। हालांकि कला से जुड़े लोग टोलियां बनाकर परंपरा जिंदा रखने जद्दोजहद कर रहें हैं। एक जमाना था, जब लोग स्वयं होकर नर्तक दलों को घर के सामने और आंगन में नचाते थे। फिर इन्हें अपनी क्षमतानुसार रुपए और अनाज देकर विदा करते थे। बदले में नर्तक दल सुख-समृद्धि का आशीष देते थे। हर घर की आंगन सुआ गीत से गुलजार हो उठते थे। लेकिन कुछ सालों से यह परंपरा सिर्फ़ बच्चों तक सिमटकर रह गई है। भौतिकता की भागमभाग में परंपरागत लोकनृत्यों का भविष्य कहीं न कहीं अब दांव पर है। रायपुर से लगे खरोरा क्षेत्र में महिलाएं टोलियां बनाकर सुआ नृत्य करने घरों में पहुंच रहें हैं। सुआ नर्तक दल घर की मुहाटी पर दस्तक देकर दीवाली के आगमन का संदेश दे रहें हैं। 

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